Jamui -खुद के पसीना बहा कर दूसरे के घरों को रौशन करने बाले कुम्हार अब खुद रोशनी के मोहताज हो रहे हैं। बड़े -बड़े मकानों में कुम्हार के चाक से बने दिये दीपावली में चार चांद लगाते हैं। लेकिन बदलती जीवन शैली और आधुनिक परिवेश में मिट्टी को आकार देने वाला कुम्हार आज उपेक्षा का दंश झेल रहा है। बाजारों में चाइनीज झालरों की धमक ने मिट्टी के दीपक की रोशनी को फीका कर दिया है।
मलयपुर बस्ती निवासी कुम्हार मोहन पंडित ने बताया की 45 साल से हम मिट्टी के बर्तन तथा दिया बनाते आ रहे हैं। लेकिन बाजार में चाइनीज लाइट आ जान से अब मिट्टी के दीये की खरीददारी करने वाले ही कम रह गए हैं। एक महीना पहले से कड़ी धूप में परिवार के साथ मिट्टी के दिए तथा बर्तन बनाने में लग जाते हैं। इसके बावजूद भी मुनाफा नहीं निकल पाता है। शहर से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों तक चायनीज दीये की मांग हर साल बढती ही जा रही है। समय की मार और मंहगाई के चलते लोग अब मिट्टी के दीये उतने पसंद नहीं करते। बिजली से जलने वाले दीये और मोमबत्ती दीपावली के त्योहार पर शगुन के रुप में टिमटिमाते नजर आते हैं।
वहीं चाक पर पतीला के आकार दे रहे मसूदन पंडित बताते हैं कि मिट्टी के दीप का जमाना गया। कभी दीपावली पर्व से एक महीने पहले मोहल्लों में रौनक हो जाती थी और कुम्हारों में भी यह होड़ रहती थी कि कौन कितनी कमाई करेगा, लेकिन अब तो खरीददार ही नजर नहीं आते। कड़ी मशक्कत के बाद वाजिब दाम नहीं मिलने से कुम्हार अब अपना पैतृक व्यवसाय छोडने को मजबूर हैं। क्योंकि इससे उनके परिवार का गुजर बसर मुश्किल हो गया है। हम लोग बचपन से ही काम करते आ रहे हैं। लेकिन अब हमारे बेटे पोते लोग इस व्यवसाय में हाथ बढ़ाना भी नहीं चाहते हैं। कियूंकि इस व्यवसाय से परिवार का भरण पोषण भी सही से नहीं हो पाती है। दीपावली के दिए तैयार कर हम तो दूसरे के घरों में रोशनी पहुंचा देते हैं। लेकिन अपनों ही घरों में अंधेरा छाई रहती है। इस व्यवसाय से अपने घर तक का निर्माण नहीं पाया हूँ।
बरहट से शशिलाल की रिपोर्ट